अमेरिकी मंदी की आंधी से लड़खड़ाई चीन की अर्थव्यवस्था में 586 अरब अमेरिकी डॉलर यानी 4 ट्रिलियन यूयान के निवेश की घोषणा की गई है। निर्यात अर्थव्यवस्था की बुनियाद पर टिके चीन की ओर से उठाया गया यह अभतपूर्व कदम अमेरिका, यूरोप और जापान जैसे देशों के लिए सबक है। चीन की यह घोषणा पिछले साल के सकल घरेलू उत्पादन 33 खरब डॉलर के लगभग बराबर है और चीन इसे 2010 तक खर्च करेगा। यह फैसला बीजिंग में केंद्रीय मंत्रिमंडल, जिसे चीन में स्टेट काउंसिल कहा जाता है, ने किया और इस बारे में सरकार का कहना है कि चीन प्रो एक्टिव फिजिकल पालिसी अपनाने जा रहा है जिसकी मदद से वह देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का प्रयास करगा। शंघाई के सिटी ग्रुप इंक के अर्थशास्त्री केन पेंग को अनुमान है कि अरबों रुपये के निवेश के साथ ही चीन में घरलू मांग को बढ़ाया जाएगा पर अगर कोई यह सोच रहा है कि इससे चीन की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी तो यह बिल्कुल गलत है। यह मंदी पूरी दुनिया को अपने आगोश में लिए हुए है ऐसे में चीन का यह प्रयास ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित होगा।
अब लोग कुछ भी क्यों ना सोचें पर यह पूरी तरह से साफ हो गया है कि चीन अन्य देशों की तरह भविष्य पर निर्भर न होकर अपने वर्तमान को मजबूत करने के प्रयास में जुट गया है। इसके पहले भी चीन की स्टेट काउंसिल ने कई कार्यो के लिए 100 अरब यूआन के पैकेज की घोषणा की थी जिसके तहत हाईवे, एयरपोर्ट और अन्य बड़े प्रोजेक्टों के निर्माण कार्यो पर खर्च किया जाना है। पूरी दुनिया में अपनी मजबूती का लोहा मनवाने के लिए चीन किसी भी कीमत पर पीछे नहीं रहना चाहता है। चीन में पीपुल बैंक के गर्वनर जू एक्सियाचूआन ने विश्व के नेताओं से पिछले शनिवार को बातचीत में यह स्पष्ट कर दिया था कि चीन विश्व की अर्थव्यवस्था में अब तक अहम भागीदारी निभाता आया है पर अब समय आ गया है कि वह अपने आप को मजबूत बनाए रखे क्योंकि यह एक कठिन दौर है जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। पिछले वित्तीय वर्ष में चीन ने ग्लोबल इकॉनिमक ग्रोथ में 27 फीसदी योगदान दिया था।
इसके साथ ही चीन ने कई करों में छूट देने की घोषणा की है जिसमें फिक्स एसेट यानी की मशीनरी पर निवेश करने जैसी योजनाएं शामिल हैं। इसके साथ ही लोन पर भी भी कई तरह की छूट दी गई हैं जिससे चीन की अर्थव्यवस्था मजबूत बनी रहे। पिछले पांच साल में चीन की इकोनामी अपना विस्तार करते हुए दोहरे अंक में पहुंच गई थी जो कि आर्थिक दबाव के चलते धीर-धीर नीचे की ओर आती दिख रही है। इसका प्रमुख कारण निर्यात और रीयल स्टेट में आई मंदी है। हालांकि चीन के इतना कुछ करने के बाद भी यहां के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि चीन में अगले साल तक इकानामी अपना सबसे निचला स्तर छुएगी क्योंकि इसको लेकर चीन के अधिकारी भी पशोपेश में हैं कि उनकी नौकरी कभी भी जा सकती है।
विश्व अर्थव्यवस्था से संबंधित कई जरूरी मुद्दों पर 15 नवंबर से शुरू हो रही जी 20 समूह देशों की शिखर बैठक में भी इस पर चर्चा होगी। माना जा रहा है कि अन्य अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से ऊपर इस आर्थिक मंदी को प्रमुखता दी जाएगी। हर कोई इसके समाधान पर जरूरी कदम के लिए मांग उठाने के साथ-साथ अपनी राय भी व्यक्त करगा। इस दौर में मजबूत बने रहने के लिए भारत भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहा। दो दिन पहले ही उद्योग और वणिज्य मंत्री कमलनाथ ने सरकारी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए 250 अरब रुपये निवेश करने की बात की थी। उन्होंने स्पष्ट किया था कि यह निवेश सरकारी राजकोष पर कोई नकारात्मक असर डाले बिना किया जाएगा। अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या भारत और चीन की ओर से अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए की जा रही पहल कितनी कारगर साबित होती है? भले ही इनके फैसलों के असर के मूल्यांकन में एक या दो वर्ष लग सकता है बहरहाल विकसित देशों को चीन से सबक सीख लेनी ही चाहिए।
(लिन यानपिंग और चिया-पेक वांग के सहयोग से)
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2 टिप्पणियां:
mandi teji to bazar ka savbhav hai
narayan narayan
भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है।
लिखते रहिए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
कविता,गज़ल और शेर के लिए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
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